आरग्वध
Botanical name - Cassia fistula
Family Fabaceae
English name - purging casia
पर्याय - आरग्वध-रोगो को नष्ट करने वाला व्याधिघात, चतुरंगुल, सुवर्णक, स्वर्णभूषण, कृतमाल, दीर्घफल, आरेवत, शम्पाक, राजवृक्ष।
क्षेत्रीय नाम अमलतास, गरमालो।


स्वरूप
मध्यमाकार वृक्ष जिसके धूसर वर्ण की काण्ड त्वक होती है। फली 1-1½ फिट लम्बी तथा 1 इंच व्यास की बेलनाकार होती है। लम्बी पुष्प मंजरी जिसके पीले रंग के 2-2-5 इंच व्यास के पुष्प लगे रहते हैं। कच्ची फली हरी होती है। पकने पर कृष्ण वर्णी हो जाती है।
उत्पत्ति स्थान
समस्त भारत में पाया जाता है।
रस पंचक
वीर्य - शीत।
गुण - गुरू, स्निग्ध, मृदु।
विपाक - मधुर।
रस - मधुर।
कर्म एवं आमयिक प्रयोग
सर्वश्रेष्ठ मृदु विरेचक। वात पित्त शामक तथा कफ पित्त संशोधक होता है। शोथहर, वेदनास्थापन होने से वात व्याधियों में उत्तम है।
वात व्याधियों में फलमज्जा तथा पत्र का लेप करते हैं। अनुलोमन तथा संसन होने से विबन्ध उदावर्त में उपयोगी है।
यकृत शोथ तथा कामला में भी इसका प्रयोग करते हैं। कुष्ठ एवं कण्डू में इसके पत्र का लेप करते हैं। ज्वर में बहुत लाभदायक है।
Black water fever की इसको Drug of choice माना जाता है।
कर्ण शूल
इसके क्षार से सिद्ध तैल डालना चाहिये।
मेदो वृद्धि
अपामार्ग तंडूल की खीर का सेवन उत्तम है।
अमलतास की जड़ की छाल 10 ग्राम की मात्रा में लेकर उसे 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें और पकाएं। पानी एक चौथाई शेष रहने पर छान लें। इसमें से 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से गले की सूजन, दर्द, टांसिल में शीघ्र लाभ मिलता है।
बिच्छू का विष
अमलतास के बीजों को पानी में घिसकर बिच्छू के दंश वाले स्थान पर लगाने से कष्ट दूर होता है।
बच्चों का उदर शूल अमलतास के बीजों की गिरी को पानी में घिसकर नाभि के आस-पास लेप लगाने से उदर शूल और गैस की तकलीफमें लाभ मिलता है।
त्वचा से सम्बंधित रोग
अमलतास के पत्तों को शिरके में पीसकर बना, लेप को चर्म रोगों यानी दाद,
खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी पर लगाने से रोग दूर होता है।
अमलतास, कनेर और मकोय के पत्ते बराबर मात्रा में लेकर मट्टे के साथ पीसकर लेप बनाकर लगाने से
त्वचा के रोग में लाभ होता है।
मुखपाक (मुंह के छाले)
अमलतास की गिरी को बराबर की मात्रा में धनिये, के साथ पीसकर उसमें चुटकी-भर कत्था मिलाकर तैयार चूर्ण की आधा चम्मच मात्रा दिन में 2-3 बार चूसने से मुंह के छालों में लाभ मिलता है।
विशिष्ट योग
आरग्वधादि तैल, आरग्वधारिष्ट।
प्रयोज्यांग
फल मज्जा, पत्र, मूलत्वक।
मात्रा
क्वाथ 50 से 100 मिलीलीटर। चूर्ण 4 से 6 ग्राम। विरेचन के लिए 10 से 15 ग्राम।
रसायनिक संगठन
फलमज्जा में मुख्यतः एन्थ्राक्विनोन तथा काण्ड त्वक में टैनिन होता है।
संग्रह विधी
पके फल 7 दिन तक बालू में गाडकर रखें, पश्चात् निकालकर धूप में सुखाकर फल मज्जा निकाल लें तथा पात्र में रख लें। फल मज्जा का प्रयोग हिम या फाण्ट के रूप में करना चाहिए।