अपामार्ग

Botanical Name - Achyranthes aspera

Family Amaranthaceae

English Name - Prickly chaff powder

पर्याय अपामार्ग (दोषो का संशोधक), प्रत्यकपुष्पा, अधःशल्य, खरमंजरी, मयूरक शिखरी, आघाट, किणिही।

क्षेत्रीय नाम- चिरचिटा।

स्वरूप

सरल या शाखायुक्त छोटा क्षुप होता है। पत्र 1 से 5 इंच लम्बे, पुष्प मंजरी लम्बी होती है। वृन्तपत्रक कांटेदार तथा तीक्ष्णाग्र परिपुष्प के कारण फल वस्त्रो से चिपक जाते हैं। पके फलों के अन्दर चावल जैसे दाने होते हैं। जिन्हें अपामार्ग तण्डुल कहते हैं।

जाति

(1) श्वेत

(2) रक्त

उत्पत्ति स्थान

शुष्क प्रदेशो में

रस पंचक

वीर्य - उष्ण।

विपाक - कटु।

गुण -लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण।

रस - कटु, तिक्त।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

वात कफका शामक तथा संशोधक है।

कर्ण शूल में

अपामार्ग क्षार सिद्ध तैल का प्रयोग होता है। नस्य के लिए अपामार्ग तण्डुल सर्वोतम है। उष्ण कटु होने से पाचन संस्थान तथा श्वास संस्थान पर अच्छा प्रभाव है।

दीपन, पाचन तथा कफ निःसारक है। बीजो की खीर बनाकर भस्मक रोग में देते हैं।

वृक्क शोथ तथा अश्मरीनाशक है। मूत्रल है।

जानवरों के काटने व सांप, विच्छु, जहरीले कीड़ों के काटे स्थान पर अपामार्ग के पत्तों का ताजा रस लगाने और पत्तों का रस 2 चम्मच की मात्रा में 2 बार पिलाने से विष का असर तुरंत घट जाता है और दाह तथा शूल में लाभ मिलता है। इसके पत्तों की पिसी हुई लुगदी को दंश के स्थान पर पट्टी से बांध देने से शोथ नहीं आती और झूल दूर हो जाता है

दंत शूल

अपामार्ग की शाखा (डाली) से दातुन करने पर कभी-कभी होने वाला तेज शूल खत्म हो जाता है तथा मसूड़ों से रक्त का आना बंद हो जाता है।

अपामार्ग के फूलों की मंजरी को पीसकर नियमित रूप से दांतों पर मलकर मंजन करने से दांत मजबूत हो जाते हैं। पत्तों के रस को दांतों के शूल वाले स्थान पर लगाने से शूल में राहत मिलती है। तने या जड़ की दातुन करने से भी दांत मजबूत होते हैं एवं मुंह की दुर्गन्ध नष्ट होती है।

इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई का फोया बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के शूल में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी गुहा को भरने में मदद करता है।

सुगम प्रसव-चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ को स्त्री की योनि में रखने से प्रसव आसानी से होता है।

पाठा, कलिहारी, अडूसा, अपामार्ग इनमें से किसी एक औषधि की जड़ के तैयार लेप को नाभि, नाभि के नीचे के हिस्से पर लेप करने से प्रसव सुखपूर्वक होता है।

त्वचा रोगों में मूल या पत्र पीसकर लगाने से लाभ होता है।

स्वप्नदोष

अपामार्ग की जड़ का चूर्ण और मिश्री बराबर की मात्रा में पीसकर रख लें 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार 1-2 हफ्ते तक सेवन करें।

मुंह के छाले

अपामार्ग के पत्तों का रस छालों पर लगाएं।

विशिष्ट योग

अपामार्ग क्षार तैल, कासामृत, अगस्त्य हरितकी

प्रयोज्यांग

पंचांग, तण्डुल

मात्रा

अपामार्ग क्षार-12-1 ग्राम।

स्वरस

10-20 मिलीलीटर।

रासायनिक संगठन

इसकी पंचांग की राख बनने पर मुख्यतः पोटाश मिलता है।