अग्निमन्थ

Botanical name - Premna serratifolia

Family Verbenaceae

पर्याय - अग्निमन्थ (लकड़ियो को रगड़ने से अग्नि निकलती हैं।) जय, वातघ्नी, गणिकारिका, श्रीपर्ण, तर्कारी, वैजयन्ति।

क्षेत्रीय नाम

अरणी।

स्वरूप

छोटा वृक्ष होता है जिसके काण्ड और शाखाओं पर कण्टक होते हैं। पत्र 2 से 2.5 इंच लम्बे अण्डाकार होते हैं। फल गोलाकार मई जून में लगते हैं।

फल छोटी मकोय के समान झुमकों में लगते हैं, जो पकने पर काले हो जाते हैं।

जाति

1. अग्निमन्थ - Premna integrifolia

2. लघु अग्निमन्थ (तर्कारी) Clerodendrum phlomidis

उत्पत्ति स्थान

कुमाऊ से भूटान की पहाड़ीयो पर तथा मध्य भारत में पाया जाता है।

रस पंचक

वीर्य - उष्ण।

विपाक - कटु ।

गुण - लघु, रूक्ष।

रस - तिक्त, कटु, कषाय।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

कफ वात शामक होने से कफ वातजन्य रोगों में प्रयुक्त होता है।

शोथहर तथा वेदनास्थापन होने से वातव्याधियों में प्रयुक्त होता है।

दीपन पाचन होने से आमदोष तथा अग्निमांद्य में प्रयुक्त होता है।

अग्निमन्थ के मूल का क्वाथ पूयमेह एवं वसामेह में उपयोगी है। लघु अग्निमंथ मधुमेह में उपयोगी है। अरणीकी जड का 50 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर सुबह-शाम दोनों समय पीने से उदर का दर्द, जलोदर और सभी प्रकार की शोथ मिट जाती है।

अरणीकी जड़ और पुनर्नवा की जड़ दोनों को एक साथ पीसकर गर्म कर लेप करने से शोथ ठीक होता है।

पक्षाघात

प्रतिदिन अरणीकी जड़ के तैल का लेप करके सेंकना चाहिए। इससे पक्षाघात, जोड़ों का शूल और शोथ नष्ट हो जाती है।

शीतज्वर

अरणीकी जड़ को मस्तक से बांधना चाहिए। इससे शीतज्वर नष्ट हो जाता है

अरणीके गर्म काढ़े को गुड़ डालकर पिलाना चाहिए। इससे वात, पित्तज रोग नष्ट हो जाते हैं।

स्तन्य वृद्धि

अरणी के पत्रों का शाक बनाकर खाना चहिये।

अरणीकी 100 ग्राम जड़ों को लेकर लगभग 500 मिलीलीटर पानी में धीमी आंच पर 15 मिनट तक उबालें। इसे 50 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 2 बार पीने से पाचनशक्ति प्रबल होती है। यह औषधि पौष्टिक भी है।

अरणी के पत्तों का साग बनाकर खाने से आध्मान ठीक होता है।

कब्ज

अरणी के पत्ते और हरड़ की छाल का 100 मिलीलीटर काढ़ा करके सुबह शाम 30 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से बद्धकोष्ठता मिटती है

श्वसन संस्थान पर भी इसका अच्छा प्रभाव है।

व्यंग्य नीलिका

अरणी मूल त्वक चूर्ण का अजा दुग्ध के साथ लेप करना चाहिये।

विशिष्ट योग

दशमूलारिष्ट, अग्निमन्थ कषाय

प्रयोज्य अंग

मूल त्वक, पत्र।

मात्रा

चूर्ण 1 से 3 ग्राम, क्वाथ 50 से 100 मिलीलीटर।