अहिफेन

(Ahiphen) (अफीम )

Botanical name - Papaver somnifrum

Family - Papaveraceae

English name - Opium, Poppy seed

पर्याय आफूक, अहिफेनक, खसफलक्षीर

क्षेत्रीय नाम अफीम।

स्वरूप

वर्षायु क्षुप होता है। निःशारित काण्ड तथा श्वेत या रक्तवर्णी पुष्प होते हैं। फल छोटे अनार के समान जिसे डोडा कहते है। फल के छिलके को पोश्त तथा बीजो को पोश्तदाना कहते हैं।


उत्पत्ति स्थान - एशिया तथा यूरोप।

रस पंचाक -

वीर्य - उष्ण।

गुण - लघु, सुक्ष्म, व्यवायी।

प्रभाव - मादक ।

विपाक - कटु ।

रस - तिक्त, कषाय।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

कफ वात शामक होने से वात कफज विकारों में प्रयुक्त।

उत्तम वेदनास्थापक, मादक, निद्राजनन एवं आक्षेपहर होता है।

शूल प्रशमन तथा स्तम्भन होने से उदरशूल तथा अतीसार में प्रयुक्त होता है।

शुक्र का स्तम्भन करने के कारण यह शीघ्रपतन रोग में दिया जाता है।

स्तम्भक होने से आंतरिक अंगो से होने वाले रक्त स्त्राव को रोकता है।

रूक्ष, कषाय, व्यवायी, विकासी गुण होने के कारण इसके लगातार सेवन से पौरूष शक्ति की हानी होती है जबकी औषधि के रूप में अफीम सेवन से शीघ्रपतन जैसे रोगों मे लाभ होता है।

व्यवायी, विकासी गुण होने से यह धातु शोषक है व शरीर को दुर्बल बनाता है

भय, चिंता, क्रोध, कम्पन व प्रक्षोभ आदि रोगों में बहुत उपयोगी है।

कास, श्वाश, वात नाडी शोथ, संधीशूल, तथा अंतः स्राव नाशक है।

वेदनाजन्य निद्रानाश मे यह बहुत उपयोगी है।

यह उत्तम विषमज्वरघ्न तथा नेत्र तारक संकोचक है।

लगभग 4 से 9 ग्राम तक पोस्त के डोडे पीसकर पिलाने से अतिसार मिटता है।

अहिफेन बीज (खसखस) बल्य एवं वृष्य होते हैं।


विशिष्ट योग

अहिफेनासव, आकारकरभादि वटी, निद्रोदय वटी।

प्रयोज्य अंग

फलनिर्यास

मात्रा

30 मिलीग्राम से 1 रती।

रसायनिक संगठन
मुख्यतः मॉर्फीन, कोडीन, नार्कोटीन, पापावरीन, लॉडेनीन आदि। इसके अलावा एपोमॉर्फीन, एपोकोडीन, थिवेमीन भी मिलते हैं।

विषाक्त लक्षण

अधिक मात्रा में अहिफेन लेने पर निम्नलिखित लक्षण मिलते हैं जैसे श्वासावरोध, निद्रा, तन्द्रा, अवसाद और मृत्यु।

अहिफेन प्रयोग निषेध

फुफ्फुश शोथ, मस्तिष्कावरण शोथ, मस्तिष्कगत रक्त स्राव, जीर्ण रोगियों में।


अहिफेन विष की चिकित्सा

1. प्रतीविष जैसे आमलकी, हींग, अरिष्टक या तेजपत्र का प्रयोग।

2. हृद्य औषधीयों जैसे कॉफी, कस्तुरी मकरध्वज का प्रयोग।

अहिफेन शोधन

अहिफेन को पानी में घोलकर कपड़े से छान लें पश्चात् अग्नि पर इसको गाढ़ा कर लेवे। इसके बाद आर्द्रक स्वरूप की 21 भावना देने पर अहिफेन शुद्ध हो जाता है।