अगुरू (Agaru)

Botanical name Aquilaria agallocha

Family Thymelaeaceae

English name - Eagle wood

पर्याय अगुरू, लोह, कुमिज, कृमिजग्ध, अनार्यक, प्रवर, योगज।

क्षेत्रीय नाम अगर।

स्वरूप

सदाहरित वृक्ष होता है। पुराने वृक्षो के अन्तः काष्ठ कीटजग्ध होने से कृष्णवर्णी गंधयुक्त सार निकलता है।

पत्र 2 से 3 इंच लम्बे भालाकार।

जाति

राज निघण्टुकार ने 4 प्रकार बताये हैं।

(1) कृष्णागुरू (2) काष्ठागुरू (3) दाहागुरू (4) मंगल्यागुरू। मंगल्यागुरू सर्वश्रेष्ठ होता है।


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पुष्प

हरिताभ श्वेत, फल 1 ये 2 इंच लम्बे।

परीक्षा

जो अगुरू पानी में डुब जाए और दीयासलाई से जलाने पर जल जाये, वह उत्तम माना जाता है।

रस पंचक

वीर्य - उष्ण।

विपाक - कटु ।

गुण - लघु, रूक्ष।

रस - कटु, तिक्त।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

कफ वात शामक तथा नाड़ी उत्तेजक दीपन पाचक होने से अग्निमांद्य तथा आमदोष में उपयोगी। हृदय उत्तेजक तथा रक्त विकारों में उपयोगी होता है।

उत्तम शीत प्रशमन, बल्य तथा रसायन होने से दौर्बल्य में उपयोगी।

कफ नाशक तथा श्वासहर होने से श्वास, कास में उपयोगी।

इसका तैल स्तम्भक उष्ण, दुष्ट व्रण शोधक, त्वचा रोग में उपयोगी होता है।

त्वचा रोग

अगर का लेप करना त्वचा रोग में लाभदायक है।

दाह

अगर का चूर्ण शरीर पर लगाने से दाह में लाभ मिलता है। रास्त्रा व अगुरु का प्रलेप शीतापनयन होता हैं।

ज्वर में स्वेद आना

अगर, चंदन और नागकेसर का चूर्ण बनाकर बेर की छाल के पानी में उबालकर शरीर पर लेप करना चाहिए।

शरीर को सुगन्धित करना

अगर, कपूर, केसर, लोहबान, और नागरमोथा को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसें। इसे शरीर पर मलने से शरीर सुगन्धित हो जाता है।

कास

बच्चों की कास में अगर और ईश्वर मूल (ईश्वर की जड़) को पीसकर सीने पर लेप करने से लाभ होता है।

विशिष्ट योग

अगुर्वादी तैल अगरादि धूप

प्रयोज्य अंग

काण्डसार तथा तैल ।

मात्रा

चूर्ण 1 से 3 ग्राम।

तैल

2 से 4 बूंद ।

रसायन संगठन

Sesquiterpene नामक Alcohol विलेय पदार्थ मुख्यतः पाया जाता है।