अतीविषा

Botanical name - Aconitum heterophyllum Family Ranunculaceae

पर्याय अतिविषा (विष का अतिक्रान्त करने के कारण निर्विष है।) शिशुभैषज्या, काश्मीरा, धुणवल्लभा, शुक्लकन्दा, भंगुरा।

क्षेत्रीय नाम अतीष।

स्वरूप

इसका क्षुप सरल या शाखित 3 फीट तक ऊंचा होता है। पत्र 2 से 4 इंच लम्बे। पुष्प नीले बहुपुष्पी मंजरी में होते हैं। 1 से 12 इंच लम्बा तथा ½ इंच मोटा होता है।

जाति

(1) अतिविषा - Aconitum heterophyllum

(2) प्रतिविषा - Aconitum palmatum कठिन, गुरु तथा कृष्णाभ होती हैं।

उत्पत्ति स्थान -

हिमालय से कुमाऊ तक ऊंचाई में होती है।

रस पंचक

वीर्य - उष्ण।

विपाक - कटु ।

गुण - लघु, रूक्ष।

रस - तिक्त, कटु ।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

त्रिदोषनाशक होने से सत्रिपातज विकारों में प्रयोग किया जाता है।

उत्तम दीपन, पाचन, छर्दि निग्रहण होने से अग्निमांद्य, आमदोष, छर्दि तथा अतीसार में इसका प्रयोग होता है। तिक्त होने से रक्तशोधक तथा स्तन्य शोधक है। बालकों में होने वाली ज्वर, कास, छर्दि तथा अतिसार में यह विशेष रूप से उपयोगी है।

अतीस का चूर्ण शहद में मिलाकर स्थिति के अनुसार बालकों को ज्वर, दमा, कास और वमन होने पर देना चाहिए। अतीस और नागरमोथे के चूर्ण को शहद में मिलाकर बच्चों को सेवन कराने से ज्वर और वमन में लाभ मिलता है।

अतीस, सोंठ और गिलोय का काढ़ा बनाकर सेवन करने से संग्रहणी ठीक हो जाती है।

अतीस, नागरमोथा और काकड़ासिंघी का कपड़छन किया हुआ चूर्ण बराबर-बराबर लेकर दिन में तीन बार शहद में मिलाकर देना चाहिए। बच्चों की उम्र के अनुसार यह चूर्ण प्रत्येक बार लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक देना चाहिए। बच्चों के ज्वर और कास के लिए भी यह उत्तम प्रयोग है।

अतिसार पतला, श्वेत, दुर्गन्धयुक्त हो तो अतीस और शुंठी 10-10 ग्राम दोनों को कूटकर 2 लीटर पानी में पकायें, जब आधा शेष रह जायें तब इसे लवण से छोंककर, फिर इसमें थोड़ा अनार का रस मिला दें। इसे दिन में थोड़ा-थोड़ा करके दिन में 3-4 बार पिलाने से संग्रहणी और आम अतिसार में लाभ होता है।

अतीस का चूर्ण एक ग्राम और काकड़ासिंगी का चूर्ण आधा ग्राम मिलाकर शहद के साथ 2-3 बार चटाने से कास में लाभ होता है।

समान मात्रा में अतीस और बेल का चूर्ण मिलाकर आधा चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराएं। इससे अतिसार में लाभ होगा।

अतिसार और रक्तपित्त में अतीस के 3 ग्राम चूर्ण को, इन्द्रजौ की छाल के 3 ग्राम चूर्ण और 2 चम्मच शहद के साथ देने से अतिसार और रक्तपित्त में लाभ होता है।

विशिष्ट योग

बाल चतुर्भद्रा, अतिविषादि चूर्ण, चातुर्भद्र चूर्ण।

प्रयोज्याग

कन्द, मूल।

मात्रा

1से 3 ग्राम

शोधन

गोमयरस में प्रथम स्वेदन करे पश्चात् साफ करके धूप में सुखा लेने से अतिविषा शुद्ध हो जाती है।

विषाक्त लक्षण

अधिक मात्रा में देने से कम्पवात तथा गलशोष जैसे लक्षण प्रकट होते हैं।