अशोक

Botanical name - Saracs asoca

Family Fabaceae

पर्याय अशोक, ताम्रपल्लव, हेमपुष्प, वंजुल, पिण्डपुष्प ।

क्षेत्रीय नाम -अशोक।

स्वरूप

सदाहरित मध्यमाकार वृक्ष होता है। पत्र अवृत्त तथा पत्रक 5-6 इंच लम्बे होते हैं। पुष्प सघन गुच्छो में जिनसे लाल रंग के पुंकेसर बाहर निकले रहते हैं।

शिम्बी 5-10 इंच लम्बी जिसमे चपटे बीज होते हैं।

उत्पत्ति स्थान

मध्य एवं पूर्वी हिमालय तथा दक्षिण

भारत में होता है।

रस पंचक -

वीर्य - शीत ।

विपाक - कटु ।

गुण - लघु, रूक्ष।

रस - कषाय, तिक्त।

कर्म एवं आमयिक प्रयोग

कफ पित्त विकारों में प्रयुक्त होता है। प्रजनन संस्थान पर सर्वोत्तम कार्य करता है। गर्भाशय शैथिल्य पीड़ा व स्त्राव समाप्त करता है।

गर्भाशय अन्तः कला तथा वीजकोष पर भी उत्तेजक प्रभाव दिखाता है।

रक्त तथा श्वेत प्रदर, कष्टार्तव तथा गर्भाशय शैथिल्य में उपयोगी है।

उत्तम वेदना स्थापन तथा रक्त स्तम्भन होता है।

बीजों का चूर्ण मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी में भी देते है।

गर्भ स्थापना हेतु
अशोक के फूल दही के साथ नियमित रूप से सेवन करते रहने से स्त्री का गर्भ स्थापित्त होता है।

श्वेत प्रदर अशोक की छाल का चूर्ण और मिश्री समान मात्रा में मिलाकर गाय के दूध के साथ 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार कुछ हफ्ते तक सेवन करते रहने से श्वेत प्रदर नष्ट हो जाता है।

अतिसार, प्रवाहिका में बीजों का चूर्ण जल के साथ सेवन करना चाहिये।

रक्त प्रदर में

अशोक की छाल, सफेद जीरा, दालचीनी और इलायची के बीज को उबालकर काढ़ा तैयार करें और छानकर दिन में 3 बार सेवन करें।

योनि के ढीलेपन के लिए

अशोक की छाल, बबूल की छाल, गूलर की छाल, माजूफल और फिटकरी समान भाग में पीसकर 50 ग्राम चूर्ण को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें, 100 मिलीलीटर शेष बचे तो उतार लें, इसे छानकर पिचकारी के माध्यम से रोज रात को योनि में डालें, फिर 1 घंटे के पश्चात् मूत्रत्याग करें। कुछ ही दिनों के प्रयोग से योनि तंग हो जायेगी।

मूत्र में रुकावट

अशोक के बीज पानी में पीसकर नियमित रूप से 2 चम्मच की मात्रा में पीने से मूत्र न आने की शिकायत और अश्मरी के कष्ट में लाभ मिलता है।

मंदबुद्धि (बृद्धिहीन)

अशोक की छाल और ब्राह्मी का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच सुबह-शाम एक कप दूध के साथ नियमित रूप से कुछ माह तक सेवन करें। इससे बुद्धि का विकास होता है।

श्वास फूलना

पान में अशोक के बीजों का चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में चबाने से श्वास फूलने की शिकायत में लाभ मिलता है।

रक्तार्श

अशोक की छाल का 40-50 मिलीलीटर काढ़ा पिलाने से रक्त अर्श में रक्त का बहना बंद हो जाता है।

विशिष्ट योग

अशोक घृत, अशोकारिष्ट

प्रयोज्यांग

पुष्प, त्वक, बीज

मात्रा

क्वाथ 50 से 100 मिलीलीटर, चूर्ण 3-6 ग्राम।

रासायनिक संगठन

छाल में मुख्यतः हीमेटॉक्सिलिन, ग्लारकोसाइड, Ca तथा लौहे के यौगिक पाये जाते हैं।