अर्जुन
Botanical name Terminalia arjuna
Family Combretaceae
पर्याय अर्जुन, धवल, नदीसर्ज, इन्द्रदु, ककुभ, वीरवृक्ष, वीर।
क्षेत्रीय नाम हिन्दी अर्जुन, काहू गु. सादेड़ो, म. सदख।


स्वरूप
बड़ा वृक्ष होता है। काण्ड त्वक श्वेत और चिकनी अन्दर रक्तवर्णी होती है। पत्र अमरूद के सदृश्य 4 से 6 इंच लम्बे। फल कमरख के सदृश्य थोड़े छोटे, पुष्प पीताभ - श्वेत मंजरीयो में लगे रहते हैं।
उत्पत्ति स्थान
मध्य भारत तथा हिमालय प्रदेश।
रस पंचक
वीर्य - शीत ।
विपाक - कटु ।
गुण - लघु, रूक्ष।
रस कषाय।
प्रभाव हृद्य।
कर्म एवं आमयिक प्रयोग
कफ पित्त शामक होने से कफपैत्तिक विकारों में प्रयुक्त होता है।
कषाय होने से व्रण रोपण, रक्तस्तम्भन तथा सन्धानीय है।
हृदय मांस पेशीयो के लिए उत्तम बल्य है। हदय नियमित करता हैं।
इसकी छाल का दूध के साथ सेवन व अस्थिसंधानीय है। अस्थी भग्न में अर्जुन कल्क लगाकर पट्टी बांधें।
रक्तातिसार
अजा दुग्ध के साथ अर्जुन क्षीरपाक मक्खन के साथ सेवन करना उत्तम है।
रक्तपित्त, क्षतज कास तथा रक्तप्रदर में भी उपयोगी है। Anticoagulant भी होता है।
अर्जुन की छाल को 400 ग्राम ले कर 500 मिली पानी में पकाये 200 मिली रहने पर उतार ले और हर रोज
सुबह-शाम 10-10 मिली. ले। इससे रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल कम हो जायेगा, रक्त के थक्के साफ हो जायेंगे।
अर्जुन के सेवन से अल्सर में भी आशातीत लाभ होता है।
अर्जुन की चाय भी बना कर पी जा सकती हैं। साधारण चाय की जगह अर्जुन की कुटी हुई छाल डालिये। और चाय की तरह बना कर पीजिये।
अनेको हृदय रोगियों को इस से राहत मिली है। अर्जुनकी छाल के क्वाथ को पक्षाघात के मरीजों को भी देते हैं जिस से उनको बहुत लाभ होता है।
Varicose veins में भी ये बहुत उपयोगी है।
विशिष्ट योग
अर्जुनारिष्ट, अर्जुन घृत, प्रभाकर वटी।
प्रयोज्यांग
त्वक् ।
मात्रा
चूर्ण - 3-6 ग्राम, क्वाथ 50-100 मिलीलीटर। स्वरस-10 से 20 मिलीलीटर।
रासायनिक संगठन
छाल में मुख्यतः Arjunetin तथा Fridelin ग्लूकोसाइड पाया जाता है।